Sawan-2023: जानें श्रावण में रुद्राभिषेक करने का महत्व, देखें क्या लिखा है पुराणों में, इन मंत्रों के साथ शिवलिंग को कराएं स्नान, जानें पार्थिव शिवलिंग पूजा के लाभ
Sawan-2023: वैसे तो भोलेबाबा की जब भी पूजा करें या जब भी रुद्राभिषेक कराएं, सब फलदाई होता है, लेकिन श्रावण (सावन) मास में इसका एक अलग ही महत्व वेद-पुराणों में बताया गया है. इस लेख में आचार्य विनोक कुमार मिश्र सावन में रुद्राभिषेक कराने को लेकर महत्व का वर्णन कर रहे हैं. वहीं बता दें कि 16 अगस्त को अधिकमास समाप्त हो रहा है और 16 अगस्त से फिर से सावन शुरू हो रहा है.
“रुद्राभिषेकं कुर्वाणस्तत्रत्याक्षरसङ्ख्यया, प्रत्यक्षरं कोटिवर्षं रुद्रलोके महीयते। पञ्चामृतस्याभिषेकादमृत्वम् समश्नुते।। ”
यानी श्रावण में रुद्राभिषेक करने वाला मनुष्य उसके पाठ की अक्षर-संख्या से एक-एक अक्षर के लिए करोड़-करोड़ वर्षों तक रुद्रलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। पंचामृत का अभिषेक करने से मनुष्य अमरत्व प्राप्त करता है।
श्रावण मास में भूमि पर शयन
“केवलं भूमिशायी तु कैलासे वा समाप्नुयात” – स्कन्दपुराण
यानी श्रावण मास में भूमि पर शयन करने से मनुष्य कैलाश में निवास प्राप्त करता है।
पार्थिव शिवलिंग
जो पार्थिव शिवलिंग का निर्माण कर एक बार भी उसकी पूजा कर लेता है, वह दस हजार कल्प तक स्वर्ग में निवास करता है, शिवलिंग के अर्चन से मनुष्य को प्रजा, भूमि, विद्या, पुत्र, बान्धव, श्रेष्ठता, ज्ञान एवं मुक्ति सब कुछ प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य ‘शिव’ शब्द का उच्चारण कर शरीर छोड़ता है वह करोड़ों जन्मों के संचित पापों से छूटकर मुक्ति को प्राप्त हो जाता है।
कलियुग में पार्थिव शिवलिंग पूजा ही सर्वोपरि है
कृते रत्नमयं लिंगं त्रेतायां हेमसंभवम्
द्वापरे पारदं श्रेष्ठं पार्थिवं तु कलौ युगे
यानी शिवपुराण के अनुसार पार्थिव शिवलिंग का पूजन सदा सम्पूर्ण मनोरथों को देनेवाला हैं तथा दुःख का तत्काल निवारण करनेवाला है।
पार्थिवप्रतिमापूजाविधानं ब्रूहि सत्तम।।
येन पूजाविधानेन सर्वाभिष्टमवाप्यते।।
अग्निपुराण के अनुसार
त्रिसन्ध्यं योर्च्चयेल्लिङ्गं कृत्वा विल्वेन पार्थिवम्।
शतैकादशिकं यावत् कुलमुद्धृत्य नाकभाक् ।।
जो प्रतिदिन तीनों समय पार्थिव लिङ्ग का निर्माण करके बिल्वपत्रों से उसका पूजन करता है, वह अपनी एक सौ ग्यारह पीढ़ियों का उद्धार करके स्वर्गलोक को प्राप्त होता है।
स्कंदपुराण के अनुसार
प्रणम्य च ततो भक्त्या स्नापयेन्मूलमंत्रतः॥
ॐहूं विश्वमूर्तये शिवाय नम॥
इति द्वादशाक्षरो मूलमंत्रः॥
“ॐ हूं विश्वमूर्तये शिवाय नम॥” यह द्वादशाक्षर मूल मंत्र है।इससे शिवलिंग को स्नान कराना चाहिए।
DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)