Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट…’काजी की अदालत’, ‘दारुल कजा’ या ‘शरिया कोर्ट’ के फैसले को कानूनी मान्यता नहीं
Supreme Court: ‘काजी की अदालत’, ‘दारुल कजा’ या ‘शरिया कोर्ट’ जैसे किसी भी निकाय को भारतीय कानून के तहत कोई मान्यता प्राप्त नहीं है, इस अहम फैसले को एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है. सोशल मीडिया पर वायरल खबरों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इनके द्वारा दिया गया कोई भी निर्देश या निर्णय कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होता।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक महिला द्वारा दायर याचिका की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने की है. दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस मामले के एक फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें फैमिली कोर्ट ने ‘काजी की अदालत’ में हुए समझौते के आधार पर निर्णय दिया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को गलत ठहराया और इस बात को साफ किया कि इस तरह के निकायों का निर्णय केवल उन पक्षों के लिए मान्य हो सकता है जो स्वेच्छा से उस पर अमल करने के लिए सहमत हों, लेकिन इसे कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के मामले का दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के सामने आने के बाद साल 2014 में दिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले विश्व लोचन मदन बनाम भारत सरकार के मामले की जानकारी दी जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि शरिया अदालतों और उनके फतवों को भारतीय कानून में कोई मान्यता प्राप्त नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि कोई भी गैर-सरकारी निकाय बलपूर्वक किसी पर अपने निर्णय लागू नहीं कर सकता। बता दें कि यह फैसला 4 फरवरी को सुनाया गया था, जो अब सार्वजनिक हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिया ये आदेश
बता दें कि इस मामले में फैमिली कोर्ट में दी गई दलील को सुप्रीम कोर्ट ने कानून के सिद्धांतों के खिलाफ और केवल अनुमान पर आधारित करार दिया है और फैमिली कोर्ट के फैसले को पलट दिया. इसी के साथ ही कोर्ट ने यह बात भी दोहराई कि केवल किसी समझौता डीड के आधार पर भी अदालतें निष्कर्ष नहीं निकाल सकतीं। इसी के साथ ही पीड़ित महिला के पति को निर्देश दिया है कि पत्नी के भरण-पोषण के रूप में याचिका दायर करने की तिथि से प्रतिमाह 4,000 रुपए का भुगतान करे।
जानें क्या है मामला?
इस्लामी रीति-रिवाजों के मुताबिक एक महिला का विवाह 24 सितंबर 2002 को हुआ था. दोनों की ये शादी दूसरी बार थी. भोपाल में ‘काजी की अदालत’ में 2005 में महिला के खिलाफ तलाक का मुकदमा दायर किया गया था. हालांकि बाद में समझौते होने पर मामला खारिज हो गया. इसके बाद 2008 में महिला का पति ‘दारुल कजा’ में फिर से तलाक के लिए मामला दायर कर दिया. इस पर 2009 में तलाकनामा जारी कर दिया गया। इसके बाद महिला ने भरण-पोषण की मांग के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और याचिका दायर की लेकिन फैमिली कोर्ट ने यह तर्क देते हुए याचिका खारिज कर दी कि महिला स्वयं घर छोड़कर गई थी और यह कि चूंकि यह दोनों की दूसरी शादी थी, इसलिए दहेज की मांग की संभावना नहीं थी।