Dhanteras: धनतेरस पर इस विधि से करें स्नान और दीपदान… खत्म होगा अकाल मृत्यु का भय

October 28, 2024 by No Comments

Share News

Dhanteras Special: सनातन धर्म (Sanatan Dharma) में धनतेरस के त्योहार कई मायनों में बहुत ही खास माना गया है. कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को हर साल मनाया जाता है। इस त्योहार को लेकर भारतीय ज्योतिष अनुसन्धान संस्थान के निदेशक विनोद कुमार मिश्र बताते हैं कि स्कंद पुराण के अनुसार धनतेरस को दीपदान करने वाले की अकाल मृत्यु नहीं होती है। धनतेरस को लक्ष्मी का पूजन धन, सुख-शांति व आंतरिक प्रेम देता है। इसीलिए इस दिन यम-दीपदान जरूर करना चाहिए।

चूंकि इस दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जनक धन्वन्तरि वैद्य की जयंती भी मनाई जाती है. इसलिए इस दिन को बीमारी भगाने वाला भी दिन माना गया है. यही वजह है कि इस दिन धन्वन्तरि भगवान की भी पूजा की जाती है. इसी के साथ ही कार्तिक मास का स्नान सबसे पवित्र और मोक्ष देने वाला बताया गया है। इसलिए धनतेरस के दिन हल जुती मिट्टी को दूध में भिगोकर उसनें सेमर की शाखा डालकर लगातार तीन बार अपने शरीर पर फेरना चाहिए और कुमकुम लगाना चाहिए। इसके बाद कार्तिक स्नान करके प्रदोष काल में घाट, गौशाला, कुंआ, बावली,मंदिर आदि स्थानों पर तीन दिन तक दीपक जलाना चाहिए। इसी के साथ तुला राशि के सूर्य में चतुर्दशी व अमावस्या की संध्या को जलती लकड़ी की मशाल से पितरों का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।

इस दिन न दें उधार

आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि इस दिन किसी को भी कोई वस्तु उधार नहीं देना चाहिए. अगर ऐसा करते हैं तो पूरे साल धन का नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी के साथ धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदकर ले आएं और उसे लाल कपड़े में लपेट दें। इसके बाद रोली, अक्षत से पूजा करें। धूपबत्ती दिखाएं और मिठाई का भोग लगाकर लक्ष्मी जी व कुबेर जी का ध्यान करके धनसम्पत्ति की कामना करें। इसके बाद इस झाड़ू को घर में ही छुपा कर रख दें ताकि किसी बाहरी की नजर न पड़े। साल भर इसे रखें और अगले धनतेरस पर जब फिर झाड़ू की इसी तरह पूजा कर लें तो इस झाडू को इस्तेमाल के लिए निकाल लें। ऐसा करने से साल भर लक्ष्मी जी की कृपा बनी रहती है।

अकाल मृत्यु का समाप्त होता है भय

भारतीय ज्योतिष अनुसन्धान संस्थान के निदेशक विनोद कुमार मिश्र बताते हैं कि इस दिन यम-दीपदान जरूर करना चाहिए। ऐसा करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है। पूरे वर्ष में एक मात्र यही वह दिन है, जब मृत्यु के देवता यमराज की पूजा सिर्फ दीपदान करके की जाती है। कुछ लोग नरक चतुर्दशी के दिन भी दीपदान करते हैं।

स्कंद पुराण में लिखा है , “कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे ।
यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनिश्यति।।” अर्थात कार्तिक मासके कृष्णपक्ष की त्रयोदशी के दिन सायंकाल में घर के बाहर यमदेव के उद्देश्य से दीप रखने से अपमृत्यु का निवारण होता है।

तो वहीं पद्मपुराण में लिखा है, ” कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां तु पावके।
यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनश्यति।।” अर्थात कार्तिक कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को घर से बाहर यमराज के लिए दीप देना चाहिए इससे दुर्गम मृत्यु का नाश होता है।

यम-दीपदान की सरल विधि

यमदीपदान प्रदोषकाल में करना चाहिए। इसके लिए आटे का एक बड़ा दीपक लें। गेहूं के आटे से बने दीप में तमोगुणी ऊर्जा तरंगे एवं आपतत्त्वात्मक तमोगुणी तरंगों (अपमृत्यु के लिए ये तरंगे कारणभूत होती हैं) को शांत करने की क्षमता रहती है । तदुपरान्त स्वच्छ रुई लेकर दो लम्बी बत्तियॉं बना लें । उन्हें दीपक में एक -दूसरे पर आड़ी इस प्रकार रखें कि दीपक के बाहर बत्तियों के चार मुँह दिखाई दें । अब उसे तिल के तेल से भर दें और साथ ही उसमें कुछ काले तिल भी डाल दें । प्रदोषकाल में इस प्रकार तैयार किए गए दीपक का रोली , अक्षत एवं पुष्प से पूजन करें । उसके पश्चात् घर के मुख्य दरवाजे के बाहर थोड़ी -सी खील अथवा गेहूँ से ढेरी बनाकर उसके ऊपर दीपक को रखना है । दीपक को रखने से पहले प्रज्वलित कर लें और दक्षिण दिशा (दक्षिण दिशा यम तरंगों के लिए पोषक होती है अर्थात दक्षिण दिशा से यमतरंगें अधिक मात्रा में आकृष्ट एवं प्रक्षेपित होती हैं) की ओर देखते हुए चार मुँह के दीपक को खील आदि की ढेरी के ऊपर रख दें । ‘ॐ यमदेवाय नमः ’ कहते हुए दक्षिण दिशा में नमस्कार करें।

यम दीपदान का मन्त्र

मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम।।

इसका अर्थ है, धनत्रयोदशी पर यह दीप मैं सूर्यपुत्र को अर्थात् यमदेवताको अर्पित करता हूं। मृत्यु के पाश से वे मुझे मुक्त करें और मेरा कल्याण करें।

DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। किसी भी धार्मिक कार्य को करते वक्त मन को एकाग्र अवश्य रखें। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)

ये भी पढ़ें-Dhanteras Katha: धनतेरस कथा… माता लक्ष्मी को किसान के पास क्यों रहना पड़ा 12 साल?