गिरिजा देवी पूजन 5 को…माता पार्वती के साथ जरूर करें इनकी भी पूजा; नहीं तो व्रत माना जाएगा अधूरा

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Girija Devi Puja: आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन गिरिजा पूजा यानी गिरिजा देवी की पूजा की जाती है. तो वहीं नवरात्र के दिनों में भी गिरिजा पूजा कर सकते हैं. इस बार यह पूजन-व्रत 5 जुलाई को पड़ रहा है. यह पूजा देवी पार्वती यानी गिरिजा मां को समर्पित एक धार्मिक अनुष्ठान है।

यह पूजा विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के द्वारा अपने पति और परिवार के कल्याण के लिए की जाती है लेकिन इसे कुंवारी लड़कियां भी कर सकती हैं. मान्यता है कि इस व्रत व पूजा करने से कुंवारी युवतियों को उनके मनपसंद वर मिलते हैं.

बता दें कि गिरिजा पूजा को गौरी पूजा या गणगौर पूजा के रूप में भी जाना जाता है. यह पूजा विशेष रूप से उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान और मध्य प्रदेश के साथ ही उत्तराखंड में भी प्रचलित है.

Acharya Sushil Krishna Shastri

Acharya Sushil Krishna Shastri

आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि जो कुंवारी या सुहागिनें इस व्रत को करती हैं. उनको सुबह जल्दी उठकर स्नान करें स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए. इसी के साथ ही पूजा के स्थान की साफ-सफाई कर फूलों से सजाना चाहिए और फिर माता गिरिजा देवी की प्रतिमा या भी चित्र की स्थापना कर दीप और धूप प्रज्ज्वलित करना चाहिए.

इसके बाद देवी पार्वती (गिरिजा) का आह्वान कर उनका ध्यान करें. माता को फल, फूल, मिठाई, धूप, दीप और अन्य प्रसाद अर्पित करें. इसके बाद पार्वती चालीसा या देवी स्तोत्र का पाठ करें. हो सके तो देवी के मंत्रों का जाप भी करें और फिर आरती कर लोगों में प्रसाद वितरित करें.

इस दिन व्रत रखने वालों को फलाहार करना चाहिए और पूरा दिन माता गिरिजा के नाम का मन में जाप करते रहें. हो सके तो भजन आदि भी गाएं.

बाबा भैरव की भी करें पूजा

आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि माता गिरिजा देवी की पूजा के साथ ही बाबा भैरव की भी पूजा अनिवार्य रूप से करें. अगर ऐसा नहीं करते हैं तो ये पूजा अधूरी मानी जाएगी. माता की पूजा में चुनरी के साथ ही सिंदूर, मेहंदी, काजल आदि सुहाग का सामान भी चढ़ा सकते हैं. तो वहीं व्रती अपने क्षेत्र व परिवार की परम्परा के अनुसार भी ये व्रत और पूजा कर सकती हैं.

माता सीता करती थीं गिरिजा देवी की पूजा

बिहार के मधुबनी हरलाखी प्रखंड के फुलहर गांव में माता गिरिजा देवी का मंदिर हैं तो वहीं उत्तराखंड के सुंदर खाल गांव में भी गिरिजा देवी की मंदिर है. मान्यता है कि गिरिजा देवी की पूजा करने से भक्त हमेशा ही खुशहाल रहते हैं. माता पार्वती को ही गिरिजा देवी यानी पहाड़ों की देवी कहा गया है. माना जाता है कि जो भी उनकी शरण में आता है माता उसकी रक्षा करती हैं. जगतजननी मां सीता नियमित माता भी नियमित रूप से माता गिरिजा की पूजा करती थी. उनके आशीर्वाद से ही माता सीता को राम जैसा वर मिला। यही वजह है कि कुंवारी लड़कियों को भी इस व्रत को रखने की सलाह दी जाती है ताकि उनको सुयोग्य वर की प्राप्ति हो. बता दें कि इस स्थल का वर्णन विभन्न रामायणों व वृहत विष्णुपुराण में मिलता है।

ऐसा है माता गिरिजा का स्वरूप

माता गिरिजा की प्रतिमा चतुर्भुजी हैं। उनके हाथों में शंख्, रूद्राक्ष माला के साथ ही खड्ग है। तो उनको शरीर पर वस्त्र का सूक्ष्म अंकन है। उनके सिर पर मुकुट धारित है जो शिल्प से सजा हुआ है. मान्यता है कि गिरिजा पूजा के दिन माता सीता की भी पूजा की जाती है. कई जगहों पर इसका प्रचलन है. जनकपुरी होने के कारण नेपाल में भी इस पूजा का प्रचलन है.

DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। किसी भी प्रकार की भ्रम की स्थिति में प्रमाणिक ज्योतिषियों से ही परामर्श लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)

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