Sanatan Culture: जानें महिलाओं के लिए क्यों खास माना गया है सकट चौथ, पढ़ें दो कथा, जानें क्या होता है “पहार”, देखें कितने हैं इस व्रत के नाम
माघ कृष्ण चतुर्थी को सकट चौथ मनाया जाता है। वैसे तो प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी गणेश चतुर्थी कहलाती है और धार्मिक प्रवृत्ति की स्त्रियां उस दिन व्रत व गणेश पूजन करती हैं, लेकिन जहां तक माघ मास के कृष्ण पक्ष चतुर्थी का सवाल है तो सनातन धर्म को मानने वाली सभी महिलाएं, इस व्रत को करती हैं। कुछ संतान की दीर्घायु व स्वास्थ्य के लिए तो कुछ संतान प्राप्ति की कामना से यह व्रत करती है। इसी को लोक प्रचलित भाषा में सकट चौथ कहा जाता है। हालांकि इस व्रत को वक्रतुण्डी चतुर्थई, माही चौथ अथवा तिलकुटा चौथ भी कहा जाता है।
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि इस दिन विद्या-बुद्धि-वारिधि, संकट हरण गणेश जी तथा चंद्रमा का पूजन किया जाता है। यह व्रत संकटों तथा दुखों को दूर करने वाला है तथा प्राणी मात्र की सभी इच्छाएं व मनोकामनाएं पूरी करने वाला है। इस दिन स्त्रियां निर्जला व्रत रखती हैं।
देखें पूजन विधि
आचार्य रवि शास्त्री बताते हैं कि एक पटरे पर मिट्टी की डली को गणेशजी के रूप में रखकर उनकी पूजा की जाती है और कथा सुनने के बाद लोटे में भरा जल चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोला जाता है। रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रती महिलाएं भोजन करती हैं। हालांकि कहीं-कहीं लोग अपनी-अपनी मान्यता के अनुसार भी इस व्रत को करते हैं।
संतान के हाथों से कटवाया जाता है तिल का बकरा
आचार्य महादेव तिवारी बताते हैं कि इस व्रत में तिल को भूनकर गुड़ के साथ कूटकर तिलकुटा अर्थात तिलकुट का पहाड़ बनाया जाता है। कहीं-कहीं तिलकुटा का बकरा भी बनाया जाता है और उसकी पूजा करने के बाद घर का कोई बच्चा या संतान उसकी गर्दन काटते हुए बकरे की तरह आवाज निकालते हैं। यह प्रसाद सभी को वितरित किया जाता है। तिलकुटा से ही गणेश जी का पूजन किया जाता है। इसी के साथ इसी का बायना निकालते हैं और तिलकुटा को भोजन के साथ खाते भी हैं।
ये भी है मान्यता
मान्यता है कि जिस घर में लड़के की शादी या लड़का हुआ हो तो उस वर्ष सकट चौथ को सवा किलो तिलों को सवा किलो शक्कर या गुड़ के साथ कूटकर इसके तेहर लड्डू बनाए जाते हैं और इन्हीं लड्डुओं को बहू बायने के तौर पर अपनी सास को भेंट करती हैं।
“पहार” की है परम्परा
तमाम स्थानों पर इस दिन व्रत रहने के बाद शाम को चंद्रमा को दूध का अर्घ्य देकर पूजा की जाती है। इसी के साथ ये भी परम्परा है कि गौरी-गणेश की स्थापना कर उनका पूजन किया जाता है और साल भर उनको घर में रखा जाता है। तिल, ईख, गंजी, भांटा, अमरूद, गुड़, घी से चंद्रमा गणेश को भोग लगाया जाता है। यह नैवेद्य रात भर डलिया से ढककर रख दिया जाता है, जिसे “पहार” कहते हैं। पुत्रवती माताएं पुत्र तथा पति की सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत करती हैं और उस ढके हुए पहार को पुत्र खोलता है और फिर उसे भाई-बंधुओं में बांटा जाता है।
गणेश जी की कथा-1



गांव की प्रचलित कथा-2
गांव आदि स्थानों पर सकट चौथ को लेकर एक कथा प्रचलित है। इसके अनुसार प्राचीन समय में एक देवरानी और जेठानी थीं। जेठानी गरीब थी तो देवरानी बहुत धनी थी। वह अपनी जेठानी से अपने घर में काम कराती थी। एक दिन सकट चौथ का व्रत आया और जेठानी ने पूरे मन और श्रद्धा के साथ यह व्रत किया और व्रत के दौरान भी उसने अपनी देवरानी के घर पर काम किया। थक-हार कर जब वह शाम को अपनी टूटी-फूटी कुटिया में पहुंची तो नहा-धो कर पूजा का सामान तैयार किया। घर में कुछ था नहीं तो बच्चों से कहा कि जाकर बथुआ ले आओ। इसी के साथ जो उसने साल पर चावल की कनकी बटोरी थी, उसे कूट पीसकर लड्डू बना लिया और बथुआ से भी प्रसाद बना लिया।
इसके बाद सकट मैया की पूजा की। रात में मैया उसके घर में आई और दरवाजा खटखटाया तो जेठानी ने कहा कि माता लात मार दो खुल जाएगा गेट। क्योंकि गेट तो टाट का बना है। इस पर मैया दरवाजा खोल कर घर में घुस जाती हैं और कहती हैं कि खाने के लिए कुछ लाओ। इस पर जेठानी कहती है कि मैया हमारे घर में तो कुछ है नहीं। जो था उसी से प्रसाद बनाया है। इतना कहकर जेठानी ने माता को कनकी वाले चावल के लड्डू दिए। जब माता ने खा लिया तो उन्होंने कहा कि अब उनको लैट्रीन करनी है। इस पर जिठानी ने कहा कि सब लिपा-पुता पड़ा है जहां चाहे वहां कर लो। इस पर माता ने पूरे घर में लैट्रीन कर दी और जेठानी के बाल में भी पोछ दी।
दूसरी दिन जब जेठानी देवरानी के घर काम पर नहीं पहुंची तो देवरानी ने पता लगवाया। इस पर लोगों ने बताया कि जिठानी का घर तो महल की तरह हो गया है और उनके बाल भी सोने की तरह हो गए हैं। इस पर देवरानी दौड़ती हुई जेठानी से घर पहुंची और इस चमत्कार के बारे में पूछा। इस पर जिठानी ने सब कुछ बता दिया। सुनते ही देवरानी ने भी सकट चौथ का व्रत करने की ठानी। साल भर बाद जब व्रत आया तो उसने भी जिठानी की तरह बथुआ और चावल की कनकी के लड्डू बनाए। जबकि देवरानी के घर में सबकुछ था। रात में माता आई तो देवरानी बोली कि उसके घर में कुछ नहीं है। बथुआ और कनकी चावल के लड्डू बनाए हैं खा लो। माता ने वो खा लिया और फिर कहा कि लैट्रीन लगी है तो देवरानी ने जेठानी वाली बात ही दोहरा दी और माता लैट्रीन करके चली गईं। उनके जाते ही पूरा घर बदबू से भर गया। इस पर देवरानी जेठानी पर जमकर बरसी और कहा कि तुमने मुझे गलत सलाह दी। इस पर जेठानी ने कहा कि जब तुम्हारे पास सब कुछ था तब तुमने माता को रूखा-सूखा प्रसाद क्यों खिलाया। इसीलिए माता ने तुम्हारा ये हाल कर दिया है। सकट मैया जैसे जिठानी के दिन बहुरे, वैसे सभी के दिन बहुरें। जय हो सकट माता की।
DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)