Tulsi Vivah Kath: तुलसी विवाह पर अवश्य पढ़ें ये कथा…
Tulsi Vivah Kath: कार्तिक शुक्ल एकादशी को देवउठनी एकादशी के दिन से ही सनातन धर्म में तुलसी विवाह का आयोजन शुरू हो जाता है. कई लोग द्वादशी तो कई कार्तिक पूर्णिमा को तुलसी विवाह का आयोजन करते हैं. हालांकि कहीं-कहीं एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक तुलसी विवाह का आयोजन होता है और इन पांच दिनों तक घरों से लेकर मंदिर तक में उत्सव मनाए जाते हैं. माना जाता है कि जिसकी कन्या नहीं होती वह अगर तुलसी जी का विवाह करते हैं तो उनको कन्यादान जितना ही फल मिलता है.
कथा
मान्यता है कि पौराणिक काल में जालंधर नाम के राक्षस ने इतना उत्पात मचाया था कि देवताओं और ऋषि-मुनियों का भी जीना मुश्किल हो गया था। उसकी पत्नी वृंदा ही उसकी वीरता की रहस्य थी। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी और दिन-रात पूजा में लगी रहती थी। उसकी पूजा से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न थे और हमेशा उसके सुहाग की रक्षा किया करते थे। इसी वजह से जालंधर को कोई हरा नहीं पाता था। जालांधर से परेशान होने के बाद एक दिन देवता व ऋषि-मुनि भगवान विष्णु के पास रक्षा करने की गुहार लगाने पहुंचे। इस पर भगवान विष्णु ने वृंदा का पितव्रता धर्म भंग करने का निश्चय लिया। उन्होंने योगमाया द्वारा एक मृत शरीर वृंदा के आंगन में फिंकवा दिया। माया का पर्दा पड़ा होने के कारण वृंदा को वह शव अपने पति का शव दिखाई दिया। यह देखकर वृंदा रोने लगी। इतने में एक साधू आए और उन्होंने कहा कि वह मृत शरीर में जान डाल देंगे।
इसके बाद साधू ने मृत शरीर में जान डाल दी और वृंदा भाव से भर गईं और मृत शरीर का आलिंगन कर लिया, जिससे उनका पतिव्रता धर्म नष्ट हो गया। बाद में वृंदा को भगवान का यह छल मालूम हो गया। दूसरी ओर वृंदा का पतिव्रता धर्म नष्ट होते ही जालांधर युद्ध में देवताओं द्वारा मार दिया जाता है। इस पर वृंदा ने क्रोधित होकर भगवान विष्णु को श्राप दिया कि जिस तरह तुमने मुझे पतिवियोग दिया है उसी तरह तुम भी अपनी स्त्री के छल पूर्वक हरण होने के बाद स्त्री वियोग सहोगे और मृत्युलोक में जन्म लोगे। यह कहकर वृंदा अपने पति के साथ सती हो गई।
इस पर भगवान विष्णु लज्जित हुए और फिर लक्ष्मी जी ने वृंदा की चिता राख में आंवला, तुलसी व मालती के पौधे लगाए। विष्णु जी ने तुलसी को ही वृंदा का रूप समझा और अपने पत्थर रूप शालिग्राम के साथ पूजे जाने का वरदान दिया। ये तो सभी को मालूम है कि भगवान राम विष्णु जी का ही अवतार हैं और माता सीता के छल से हरण के बाद उनको स्त्री वियोग सहना पड़ा था। कहीं-कहीं यह भी कथा प्रचलित है कि वृंदा ने ही विष्णु जी को पत्थर का हो जाने का श्राप दिया था। एक बार वृंदा से विष्णु जी बोले कि तुम मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय हो गई हो। यह तुम्हारे सतीत्व का ही फल है कि तुम मेरे साथ तुलसी बनकर सदा रहोगी। जो लोग मेरे साथ तुम्हारा विवाह करेंगे, वो मोक्ष को प्राप्त होंगे। तभी से शालिग्राम और तुलसी विवाह की परम्परा चली आ रही है। विष्णु भगवान की किसी भी पूजा में अगर तुलसी दल न हो तो पूजा अधूरी मानी जाती है। तुलसी और विष्णु जी को लेकर अन्य कथाएं भी प्रचलित हैं।
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