Varuthini Ekadashi: वरुथिनी एकादशी पर भूल कर भी न करें ये काम…पढ़ें राजा-भालू की कथा
Varuthini Ekadashi: वैशाख मास की कृष्ण पक्ष एकादशी को वरुथिनी एकादशी कहते हैं. इस दिन सुपात्र ब्राह्मण को दान देने, करोड़ों वर्षों तक ध्यान मग्न तपस्या करने तथा कन्यादान के फल से बढ़कर वरुथिनी एकादशी का व्रत माना गया है. सनातन धर्म में मान्यता है कि इस व्रत को सुख-सौभाग्य का प्रतीक माना गया है. इस व्रत को करने से सभी प्रकार के पाप कट जाते हैं और स्वर्ग की प्राप्ति होती है.
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री कहते हैं कि इस दिन भक्तिभाव से भगवान मधुसूदन (भगवान विष्णु) की पूजा करनी चाहिए. मान्यता है कि इस व्रत को करने से भगवान मधुसूदन की प्रसन्नता प्राप्त होती है और सम्पूर्ण पापों का नाश हो जाता है. इस व्रत को करने से एक दिन पहले यानी दशमी के दिन एक ही बार भोजन करना चाहिए और फिर एकादशी को ये व्रत रखना चाहिए. इस दिन कुछ वस्तुओं का पूरी तरह से त्याग करना चाहिए. इसी के साथ दिन रात में जागरण करते हुए भगवान का स्मरण करना चाहिए. द्वादशी को मांस आदि का परित्याग करके व्रत का पारण करना चाहिए.
मान्यता है कि वरूथिनी एकादशी का व्रत सौभाग्य, भोग, मोक्ष प्रदायक है. इससे विद्यादान का तथा 10,000 वर्षों की तपस्या के समान फल मिलता है व इसका माहात्म्य पढ़ने-सुनने से 1000 गोदान का फल प्राप्त होता है. इस व्रत को करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं. भगवान का चरणामृत ग्रहण करने से आत्मशुद्धि होती है.
न करें ये काम
इस दिन भूलकर भी पान न खाएं.
दूसरों की निन्दा न करें.
दातुन भी भूलकर न करें.
क्रोध न करें.
इस दिन जुआ नहीं खेलना चाहिए.
इस दिन झूठ न बोलें.
व्रत में तेल युक्त भोजन न करें.
इस दिन सोना भी नहीं चाहिए.
कथा
प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक राजा राज्य करता था. वह बहुत ही दानशील तथा तपस्वी थी. एक दिन जब वह जंगल में तपस्या कर रहा था. उसी वक्त न जाने कहां से एक जंगली भालू आ गया और राजा का पैर पकड़ कर चबाने लगा लेकिन राजा जरा भी नहीं डिगा और वह लगातार तपस्या में लीन रहा.
इस पर भालू कुछ देर तक तो राजा का पैर चबाता रहा और फिर राजा को घसीटकर पास के जंगल में ले गया. इस पर राजा बहुत डर गया लेकिन उसने अपना तापस धर्म नहीं छोड़ा. यानी उसने किसी तरह का क्रोध नहीं किया और न ही हिंसा की. वह लगातार भगवान विष्णु की प्रार्थना करता रहा.
राजा ने करुण भाव से भगवान विष्णु को पुकारना शुरू कर दिया. इस पर भगवान विष्णु प्रकट हो गए और उन्होंने चक्र से भालू को मार डाला. चूंकि राजा का पैर भालू पहले ही खा चुका था. इसलिए राजा बहुत ही शोकाकुल हो गया और दुखी हो गया. इस पर भगवान विष्णु ने कहा-‘हे वत्स! दुखी मत हो. तुम मथुरा जाओ और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरी बारह अवतार मूर्ति की पूजा करो. ऐसा करने से तुम्हारे अंग फिर से वापस आ जाएंगे. इसी के साथ ही भगवान ने ये भी बताया कि जिस भालू ने तुम्हे काटा था, यह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध था. इस पर भगवान की आज्ञा मानकर राजा ने मथुरा जाकर श्रद्धापूर्वक इस व्रत को किया. इस पर वह फिर से सुंदर अंगों वाला बन गया.
DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)
ये भी पढ़ें-Akshay Tritiya: पितृ दोष दूर करने के लिए अक्षय तृतीया पर दान करें ये सब…