Chhath Puja Katha: छठ पूजा-व्रत में भूलकर भी न करें ये छ: गलतियां…पढ़ें सूर्य देव की बहन की कथा-Video

October 27, 2025 by No Comments

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Chhath Puja Katha: सूर्य देव की उपासना का चार दिवसीय महापर्व डाला छठ कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इस दौरान व्रती महिलाएं 36 घंटे का निर्जल उपवास रखती हैं और संतान के स्वास्थ्य लाभ, सफलता और दीर्घायु के लिए वरदान मांगती हैं. इस व्रत को बड़े ही धार्मिक-आध्यात्मिक नियम के साथ किया जाता है. पहले दिन नहाय खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन अस्ताचलगामी सूर्य और चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के उपरांत व्रत का पारण किया जाता है. तो इस व्रत को लेकर कई लोककथाएं प्रचलित हैं.

सूर्यदेव को अर्घ्य देने का महत्व

मान्यता है कि छठी मइया का पवित्र व्रत रखने से सुख और शांति की प्राप्ति होती है। साथ ही सारे दुर्भाग्य समाप्त हो जाते हैं। इस व्रत से निसंतान दंपति को संतान की प्राप्ति होती है।

छठ पूजा व्रत के 6 नियम

व्रती को चारों दिन नए और साफ कपड़े पहनने चाहिए।
व्रत रखने वाले शख्स को मांस, मदिरा, क्रोध, लोभ, धूम्रपान आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
छठ पूजा में छठी मैया और भगवान भास्कर को ठेकुआ व कसारका भोग लगाना चाहिए।
छठ पूजा में सूर्य देव को अर्घ्य देने के लिए गन्ने का प्रयोग अवश्य करें।
व्रत के दौरान चार दिन तक पलंग या तख्त या बेड पर नहीं सोना चाहिए।
व्रत रखने के दौरान सात्विक भोजन ही करें।

कथा

मान्यता है कि छठ देवी को सूर्य देव की बहन माना जाता है। लेकिन छठ व्रत कथा के अनुसार, छठ देवी ईश्वर की पुत्री देवसेना बताई गई हैं। देवसेना अपने परिचय में कहती हैं कि वह प्रकृति की मूल प्रवृत्ति के छठवें अंश से उत्पन्न हुई हैं यही कारण है कि उन्हें षष्ठी पुकारा जाता है। वह कहती हैं अगर आप संतान सुख चाहते हैं तो उनकी विधि-विधान से पूजा करें। इस पूजा को कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन करने का विधान बताया गया है। वहीं एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, रामायण काल में भगवान राम के अयोध्या आने के बाद माता सीता के साथ मिलकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य की उपासना करने से भी जोड़ा जाता है। इसके महाभारत काल में कुंती द्वारा विवाह से पूर्व सूर्योपासना से पुत्र की प्राप्ति से भी इसे जोड़ा जाता है।

कहते हैं कि सूर्यदेव के अनुष्ठान से उत्पन्न कर्ण जिन्हें अविवाहित कुंती ने जन्म देने के बाद नदी में प्रवाहित कर दिया था, वह भी सूर्यदेव के उपासक थे। वे घंटों जल में रहकर सूर्य की पूजा करते रहे। मान्यता है कि कर्ण पर भगवान सूर्य की कृपा सदैव बनी रही। यही कारण है कि भगवान सूर्य की उपासना की जाती है। भगवान भाष्कर और छठी मईया की कृपा आप पर बनी रहे। जय छठी मईया।।

DISCLAIMER: यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। किसी भी धार्मिक कार्य को करते वक्त मन को एकाग्र अवश्य रखें। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।

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