Putrada Ekadashi: पुत्रदा एकादशी पर करें ये आसान उपाय…बरतें सावधानी; पढ़ें कथा व पूजन विधि
Putrada Ekadashi: श्रावण (सावन) के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है. इस बार ये एकादशी 5 अगस्त यानी कल पड़ रही है. शास्त्रों में इस एकादशी का महान पुण्य बताया गया है। हर महीने की एकदशी से अधिक पुण्य सावन के महीने में पड़ने वाली एकादशी को माना जाता है। मान्यता है कि सावन के इस पवित्र महीने में इस दिन भगवान विष्णु का पूजन करने से संतान की इच्छा रखने वालों की मनोकामना पूरी होती है।
उपाय
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि अगर इस दिन दीपक जलाकर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें तो घर में होने वाले झगड़ों से निजात मिलती है। संतान की इच्छा रखने वालों को यह व्रत अवश्य करना चाहिए। पूरे मन और एकाग्रता से किए गए इस व्रत से संतान की प्राप्ति होती है। इसके लिए आपको संकल्प कर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना होगा, लेकिन इसके लिए कुछ सावधानी भी बरतनी होगी।
सावधानी
मान्यता है कि एकादशी का व्रत पाप और रोगों का करता है। वृद्ध, बालक और रोगी को एकादशी का व्रत नही रखना चाहिये उनको चावल का त्याग करना चाहिए। अगर संतान प्राप्ति के उद्देश्य से ये व्रत कर रहे हैं तो सारा दिन व्रत रखकर भजन-कीर्तन करें। विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दक्षिणा देकर उनका आशिर्वाद प्राप्त करें। इस दौरान मन में अनुष्ठान के प्रति पूरी निष्ठा और एकाग्रता जरूर रखें। पूरे दिन भगवान का भजन-कीर्तन करें। रात में भगवान की मूर्ती के पास ही सोएं।
एकादशी व्रत के पुण्य
सूर्यग्रहण में दान करने से कई गुना अधिक पुण्य एकादशी के व्रत से मिलता है। जो पुण्य गौ-दान सुवर्ण-दान, अश्वमेघ यज्ञ से होता है, उससे अधिक पुण्य एकादशी के व्रत से मिलता है। एकादशी व्रत करने वालों के पितर नीच योनि से मुक्त होते हैं और अपने परिवारवालों पर प्रसन्नता बरसाते हैं। इसलिए यह व्रत करने वालों के घर में हमेशा सुख-शांति बनी रहती है। धन-धान्य के साथ संतान की वृद्धि होती है। कीर्ति-वैभव बढ़ता है।
प्रचलित कथा
प्राचीन काल में महिष्मती नगरी में महीजित नाम का एक धर्मात्मा राजा शासन करता था. वह बहुत ही शांतिप्रिय, दानवीर और ज्ञानी थी. उसके पास हर तरह का सुख-वैभव था लेकिन संतान नहीं थी, जिससे राजा हमेशा दुखी रहता था. एक दिन राजा ने अपने राज्य के सभी संन्यासियों, ऋषि-मुनियों और विद्वानों को बुलाकर संतान प्राप्ति का उपाय पूछा. इस पर ऋषियों में परम ज्ञानी लोमश ऋषि ने कहा-“हे राजन! आपने पिछले जन्म में श्रावण मास की एकादशी को अपने तालाब से जल पीती हुई गाय को हटा दिया था. उसी के श्राप से तुम्हें इस जन्म में संतान की प्राप्ति नहीं हो रही है और तुम दुखी हो.अगर तुम अब अपनी पत्नी के साथ पुत्रदा एकादशी का व्रत रखकर भगवान जनार्दन का विधि-विधान से पूजन करो तो तुम उस श्राप से मुक्त हो जाओगे और तुम्हारा दुख दूर होगा और तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी.” इस पर राजा ने ऋषि की आज्ञा मानकर वैसा ही किया जैसा उन्होंने कहा था. राजा ने रानी के साथ पुत्रदा एकादशी का व्रत किया और उसके प्रभाव से रानी ने एक सुंदर बच्चे को जन्म दिया. पुत्र की प्राप्ति से राजा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन्होंने पूरे राज्य में धन वितरित कराया और पुत्रदा एकादशी का महत्व बताया. इसी के साथ ही प्रण किया कि वह जब तक जीवित रहेंगे तब तक इस व्रत को करेंगे. तभी से यह व्रत लोगों में प्रचलित हो गया.
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